Saturday, December 29, 2012



""कैसा मानस वृन्द  हुआ है ?
  मानवता का  अन्ध हुआ है
 जिस भूमि पर मातृशक्ति
 की पूजा होती है नवरात्री
उस भूमि को लज्जित करना 
 मानव का आनन्द हुआ है
अपने शहर की ही गलियों में
कैसे घूम सके कोई नारी  
चप्पे चप्पे पर दुश्शासन,
शासक आंखे बंद हुआ है
कैसा मानस वृन्द  हुआ है ?
मानवता का  अन्ध हुआ है ""

Tuesday, December 4, 2012

""अपने प्यार में कार्बन-१४ भी मिला दे ऐ सनम
तेरी एक -एक याद हर जनम में ढूंढ सकूं ""

(माया सभ्यता की भविष्यवाणियो से परेशान प्रेमी वैज्ञानिक )

जो दर्द समझने बैठे हैं
वो प्यार मुहब्बत क्या जानें

ये दिल से दिल का रिश्ता है 
हम देर-दुरुस्ती क्यों मानें 
ये प्यास नहीं एहसास है ये 
बस कैसे भी हो जाता है 
दो नजरो के सम्मोहन में 
कोई योगी भी खो जाता है 
मै इसीलिए ये कहताहूँ  
हम क्यों न इसको  पहचानें
जो दर्द समझने बैठे हैं 
वो प्यार मुहब्बत क्या जानें



Saturday, December 1, 2012

वृत्त की कहानी (रामानुजम वर्ष पर विशेष)

आओं बच्चो तुम्हे सुनाएं कविता वृत्त महान की
परिधि और व्यास के रेसो पाई के बलिदान की
                                  वंदेमातरम वंदेमातरम

ये है अपना स्थिर बिंदु , केंद्र यही कहलाता है
चाप केन्द्र पर बने कोण के अंश में नापा जाता है
परिधि के दो बिंदु मिलते जीवा ये कहलाती है
स्पर्शी तो सदा वृत्त को छूकरके ही जाती है
अर्धवृत्त में बने हमेशा नब्बे कोण महान की
आओं बच्चो तुम्हे सुनाएं कविता वृत्त महान की
परिधि और व्यास के रेसो पाई के बलिदान की
                                 वंदेमातरम वंदेमातरम

एक छोटा सा वृत्तखंड है कोंण बराबर रखता है
केंद्र से डाला लम्ब सदा जीव को अर्धित करता है
तीन अरेख बिन्दुओ से बस एक वृत्त ही जाता है
चाप केंद्र पर परिधि से क्यों दूना कोण बनाता है
चक्रीय चतुर्भुज के सम्मुख संपूरक कोण महान की
आओं बच्चो तुम्हे सुनाएं कविता वृत्त महान की
परिधि और व्यास के रेसो पाई के बलिदान की
                                  वंदेमातरम वंदेमातरम

स्पर्शी और त्रिज्या में क्यों नब्बे की लड़ाई है
वृत्त की सबसे लंबी जीवा यहाँ व्यास कहलाई है
दो प्रतिछेदी रेखाएं क्यों सम आयत बन जाती हैं
बाह्य बिंदु से दो स्पर्शी इक्वल पायी जाती हैं
एकांतर वृत्खंड में बनते इक्वल कोण महान की
आओं बच्चो तुम्हे सुनाएं कविता वृत्त महान की
परिधि और व्यास के रेसो पाई के बलिदान की
                                  वंदेमातरम वंदेमातरम