Sunday, July 21, 2013

Ek boond

हे जलद पुत्री 
तेरा तो है नाता मुझसे 
मै हूँ जलधी नाना तेरा 
भाग रही क्यों मुझसे 
तो तो बड़ी अमूल्य निधि है 
नहीं छिपा है मुझसे


रवि किरणों से आह्लादित स्वाति नखत से आशीर्वादित
केले पैर जब पड़ती हो 
उससे मिल केपूर बनाती 
सर्व सुगंधि करती हो 

या फिर गिरो किसी बांस पर 
प्रेक्चप द्रव्य बनाती हो 
सारे रोग दूर करती हो 
फिर भी क्यों कतराती हो 
मेरी सूक्ति में आ जाती 
सच्चा मोती बनती हो
हो कितनी अमूल्य तो फिर क्यों 
इतना क्रंदन करती हो



Thursday, May 16, 2013


""हैं मनुज नहीं ये नर पिशाच
इनका तो वध करना होगा
कब तक होगा ये नग्न नाच
कौन्तेय युद्ध करना होगा
ये नहीं दया और क्षमापात्र
सब मानवता के भक्षक हैं
इस कलियुग में तू जन्मेजय
ये पापी सारे तक्षक हैं
बस बहुत हो चुका कायरपन
तू मन में कुछ विक्षोभ न कर
गांडीव उठा कर काट इन्हे
ये देशधर्म संकोच न कर "

Saturday, March 9, 2013

हर शख्स क्यों पेंचीदा होता जा रहा है?
कुछ हम बदल गए हैं या तुम या जमाना
फिर क्यों मामला संजीदा होता जा रहा है?
मेरा तो शौक़ था तारो को गिन के सोने का
फिर क्यों आसमा उनीदा होता जा रहा है
हर शख्स क्यों पेंचीदा होता जा रहा है?
हमे तो फक्र था के राहगीर मिलते थे
आज क्यों कारवां चुनीदा होता जा रहा है
हर शख्स क्यों पेंचीदा होता जा रहा है?

Monday, February 11, 2013

उच्छ्श्रन्खल सी कुछ लहरे
दौड़ती रहती हैं मन में
किया क्या हमने जीवन में
जिया बस मन,घर-आँगन में
अभीप्सित मिला नहीं अब तक
अलौकिक हुआ नहीं अब तक
कर्म का अर्थ, अर्थ का कर्म
नकारित है शून्यित जब मर्म
मानसिक द्वंदपूर्ण कीर्तन
आशित है अब कुछ परिवर्तन
अग्नि और जल का संयुत मेल
श्रंग और गर्त का अद्भुत खेल
विचरता रहता इस वन में
उच्छ्श्रन्खल सी कुछ लहरे
दौड़ती रहती हैं मन में
किया क्या हमने जीवन में
जिया बस मन,घर-आँगन में

Sunday, January 20, 2013

था नैतिकता का श्रृंग, आज तो गर्त रसातल
था मानवता का रंग,आज तो नर्क धरातल
चहूँ ओर कालिमा व्याप्त, हुआ नयूनित मानसबल ?
क्या तुम्हे सुखद है, नारी जाति का खूनित अंचल
अपने भीतर का अब चोर मिटाना होगा
भारत माँ को फिर सिरमोर बनाना होगा

Saturday, January 19, 2013

प्रश्न अब भी अनुत्तर हैं,
प्रश्न अब भी अधूरे हैं
हमारी सिसकियों में रंग
तुम्हारे हैं या मेरे हैं
प्रश्न अब भी अनुत्तर हैं,
प्रश्न अब भी अधूरे हैं ""
""भरे तूफ़ान में कश्ती, समंदर में चला बैठे
धडकती आग के शोलो से, खुद को हम जला बैठे||
गरूर-ऐ-इश्क ने हमको चकनाचूर कर डाला
यही गलती हमारी थी की बुत से दिल मिला बैठे ||""

Friday, January 11, 2013

“दिल को दिल रखना
कभी मोहताज मत होने देना
ये दर्द करे, चीखे, चिल्लाये
उसकी यादो में तेरी
जान निकलती जाए
उसका एहसास हो,
उसको एहसास मत होने देना
दिल को दिल रखना
कभी मोहताज मत होने देना
वो कितना भी कहें, बोले मुस्काये
उसकी धड़कन से दिल की
तान बदलती जाए
उसका आभास हो,
उसको आभास मत होने देना
दिल को दिल रखना
कभी मोहताज मत होने देना””
"ek baar sena ko kah dein ravalpindi tak jaayein
ek katey sir ke badley fir kya anjaam tumhara hoga
hum to apney kuch bujdil netao se haarey hain
warna pak-e- shaan tumahri ye samshaan tumhara hoga"