उच्छ्श्रन्खल सी कुछ लहरे
दौड़ती रहती हैं मन में
किया क्या हमने जीवन में
जिया बस मन,घर-आँगन में
अभीप्सित मिला नहीं अब तक
अलौकिक हुआ नहीं अब तक
कर्म का अर्थ, अर्थ का कर्म
नकारित है शून्यित जब मर्म
मानसिक द्वंदपूर्ण कीर्तन
आशित है अब कुछ परिवर्तन
अग्नि और जल का संयुत मेल
श्रंग और गर्त का अद्भुत खेल
विचरता रहता इस वन में
उच्छ्श्रन्खल सी कुछ लहरे
दौड़ती रहती हैं मन में
किया क्या हमने जीवन में
जिया बस मन,घर-आँगन में
दौड़ती रहती हैं मन में
किया क्या हमने जीवन में
जिया बस मन,घर-आँगन में
अभीप्सित मिला नहीं अब तक
अलौकिक हुआ नहीं अब तक
कर्म का अर्थ, अर्थ का कर्म
नकारित है शून्यित जब मर्म
मानसिक द्वंदपूर्ण कीर्तन
आशित है अब कुछ परिवर्तन
अग्नि और जल का संयुत मेल
श्रंग और गर्त का अद्भुत खेल
विचरता रहता इस वन में
उच्छ्श्रन्खल सी कुछ लहरे
दौड़ती रहती हैं मन में
किया क्या हमने जीवन में
जिया बस मन,घर-आँगन में