चार साल पहले पहली बार
जब चेन्नई पहुंचा था
सुबह सुबह चेन्नई सेंट्रल
के पास कितना अच्छा लग रहा था
सडके साफ़ लोग कतारों में
लग रहा था की कितना सृमृध
है मस्तिष्क से ये समाज
तुलना कर रहा था उत्तर से
आज जब वापस आया सोचता
हुआ की शायद सब कुछ
वैसा ही होगा जैसा
आया था छोड़कर
लेकिन हाय समय की पुकार
चारो और हाहाकार,
चीत्कार, मानवता तार -तार
बस शोर करता हुआ पैसा
कभी ट्रक कभी टेम्पो
कभी बस के रूप में
कर रहा था प्रदूषित
मानव की आत्मो को
कर रहा था हनित
वाह क्या सम्यवर्तन है
अहो कितना परिवर्तन है
जब चेन्नई पहुंचा था
सुबह सुबह चेन्नई सेंट्रल
के पास कितना अच्छा लग रहा था
सडके साफ़ लोग कतारों में
लग रहा था की कितना सृमृध
है मस्तिष्क से ये समाज
तुलना कर रहा था उत्तर से
आज जब वापस आया सोचता
हुआ की शायद सब कुछ
वैसा ही होगा जैसा
आया था छोड़कर
लेकिन हाय समय की पुकार
चारो और हाहाकार,
चीत्कार, मानवता तार -तार
बस शोर करता हुआ पैसा
कभी ट्रक कभी टेम्पो
कभी बस के रूप में
कर रहा था प्रदूषित
मानव की आत्मो को
कर रहा था हनित
वाह क्या सम्यवर्तन है
अहो कितना परिवर्तन है
No comments:
Post a Comment