Friday, November 30, 2012

नरक में नेता

""चित्रगुप्त ने एक दिन डाला,
घोटालों पर ध्यान
किसको कितनी सजा मिलेगी,
क्या है दंड विधान
क्या है दंडविधान,
सोच कर सर चकराया
धरमराज के पास.
त्यागपत्र भिजवाया
हे प्रभु जी माफ करना,
सोच कर ही जा रहा हूँ
पर नरक कि स्थिति को,
देख कर दुःख पा रहा हूँ
खाते हैं जो चारे प्रतिदिन,
उनको गर्म तेल में डाला
सारे तेल कनस्तर खाली,
नर्क जेल में भी घोटाला
फिर सोचा कि शाल्मली से,
बाँध पकड़कर इन्हे तपाऊँ
पंचक –चंडक दोनों गायब,
उनके पाश कहाँ से लाऊँ
रिश्वत मुझको भी देते हैं
इसलिए शर्मा रहा हूँ
हे प्रभु जी माफ करना,
सोच कर ही जा रहा हूँ"" (क्रमशःबाकी के घोटाले फिर कभी अभी चित्रगुप्त को रोकना है) सुबोध

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