हमने फूलों के दर्द खुद आगे बढ़कर बांटे हैं ..........................
हम काँटे हैं |
ग्रीष्म ऋतू के अनल अंगारे
बारिश की ठंडी फव्वारें
उनके तन को छूने वाले
कल कल जल के वो पतनारे
करना चाहें उन्हे पतनमुख
बस हमने ही डांटे हैं
.................................................हम काँटे हैं |
वो मधुलोभी भंवरे आते
तीखे पैने डंक चुभाते
साथी पुष्प सदा मुस्काते
किन्तु प्रिये हम सह नहीं पाते
उन पुष्पो की चीख के पीछे
छिपे हुए सन्नाटे हैं |
.................................................हम काँटे हैं|
मानव स्वार्थ दृष्टि से आयें
उनको तोडे औ मुस्काएं
मेरे प्रीतम को ले जाकर
अपने प्रियतम इष्ट मनाएं
मनुज वसन चीरकर हम भी
लेते प्रतिशोधी खराटें हैं |
....................................................... हम काँटे हैं |
हमने अपना धर्म निभाया
मातृभूमि पर शीश कटाया
जब तक चेतन प्राण रहे
प्रियतम को ही सुख पहुँचाया
किन्तु बलिदानी होकर भी पाए
क्यों तिरस्कार के चांटे हैं ?
.............................................................हम कांटे हैं |
हमने फूलों के दर्द खुद आगे बढ़कर बांटे हैं ..........................
हम काँटे हैं |
"
हम काँटे हैं |
ग्रीष्म ऋतू के अनल अंगारे
बारिश की ठंडी फव्वारें
उनके तन को छूने वाले
कल कल जल के वो पतनारे
करना चाहें उन्हे पतनमुख
बस हमने ही डांटे हैं
.................................................हम काँटे हैं |
वो मधुलोभी भंवरे आते
तीखे पैने डंक चुभाते
साथी पुष्प सदा मुस्काते
किन्तु प्रिये हम सह नहीं पाते
उन पुष्पो की चीख के पीछे
छिपे हुए सन्नाटे हैं |
.................................................हम काँटे हैं|
मानव स्वार्थ दृष्टि से आयें
उनको तोडे औ मुस्काएं
मेरे प्रीतम को ले जाकर
अपने प्रियतम इष्ट मनाएं
मनुज वसन चीरकर हम भी
लेते प्रतिशोधी खराटें हैं |
....................................................... हम काँटे हैं |
हमने अपना धर्म निभाया
मातृभूमि पर शीश कटाया
जब तक चेतन प्राण रहे
प्रियतम को ही सुख पहुँचाया
किन्तु बलिदानी होकर भी पाए
क्यों तिरस्कार के चांटे हैं ?
.............................................................हम कांटे हैं |
हमने फूलों के दर्द खुद आगे बढ़कर बांटे हैं ..........................
हम काँटे हैं |
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